शीर्षक: "चाँदपुर की दायन" बहुत साल पहले, पहाड़ों के बीच बसा एक छोटा सा गाँव था — चाँदपुर। चारों तरफ़ जंगल, बीच में नदी, और घने पेड़ों की छाया में बसे कुछ कच्चे मकान। गाँव के लोग सादा जीवन जीते थे, लेकिन एक डर हर किसी के दिल में था — “दायन की हवेली” का डर। कहानी की शुरुआत गाँव के बाहर, पुराने पीपल के पेड़ के पीछे एक टूटी-फूटी हवेली थी। लोग कहते थे कि वहाँ एक औरत की आत्मा रहती है — “गुलाबो दायन”। कहा जाता है कि वो पहले गाँव की सबसे सुंदर औरत थी। लोग उसकी सुंदरता की मिसाल देते थे, पर उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो लोगों को डराता था — गहराई, ठंडक, और रहस्य। एक दिन गाँव के कुछ लोगों ने उस पर जादू-टोने का इल्ज़ाम लगाया। किसी बच्चे की मौत के बाद सबने ग़ुस्से में आकर उसे बाँध दिया, और हवेली में जला दिया। उस रात जब आग की लपटें उठीं, उसने सिर्फ़ एक बात कही — > “मैं लौटूँगी… हर अमावस की रात… अपने बदले के लिए…” उसके बाद से, हर अमावस्या की रात को हवेली के आस-पास से अजीब आवाज़ें आतीं। कोई हँसी, कोई रुदन, और कभी–कभी किसी के नाम पुकारने की आवाज़। भय की वापसी कई सालों तक कोई उस ओर नहीं गया। लेकिन एक बार तीन नौजवान – राजू, करण और सुरेश – ने चुनौती के तौर पर अमावस की रात हवेली जाने की ठानी। गाँव वालों ने रोका, पर वो हँसते हुए बोले, > “दायन-वायन कुछ नहीं होती।” रात को तीनों हवेली पहुँचे। हवा ठंडी थी, पेड़ हिल रहे थे, और चारों तरफ़ सन्नाटा। जैसे ही उन्होंने हवेली का दरवाज़ा खोला, अंदर से इत्र और सड़े मांस की मिली-जुली गंध आई। दीवारों पर काले हाथों के निशान थे। अचानक, एक कमरे से चूड़ियों की छनक सुनाई दी… राजू ने टॉर्च जलाई — और देखा, एक औरत सफ़ेद साड़ी में खड़ी थी, बाल ज़मीन तक फैले हुए, और आँखें लाल अंगारों जैसी। वो धीरे-धीरे बोली — > “कहा था… मैं लौटूँगी…” टॉर्च बुझ गई। हवेली में चीख़ गूँजी। अगली सुबह लोग पहुँचे तो सिर्फ़ करण मिला — बेहोश, और उसके बाल सफ़ेद हो चुके थे। राजू और सुरेश… कभी नहीं मिले। आज भी... कहते हैं, हर अमावस की रात को चाँदपुर के लोग दरवाज़े बंद कर लेते हैं। कुत्ते भौंकने लगते हैं, और हवेली की टूटी खिड़कियों से किसी औरत की हँसी गूंजती है। > “गुलाबो… अब भी बदला ले रही है…”
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