एक छोटे से गाँव में दीया नाम की एक बालिका और दीपक नाम का एक बालक रहते थे। दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे। हर साल वे मिलकर दीवाली की तैयारी किया करते थे — घर सजाना, रंगोली बनाना और मिट्टी के दीये जलाना। इस साल दीवाली के एक दिन पहले, गाँव में खबर आई कि बगल के मुहल्ले में कुछ गरीब परिवारों के पास तेल और दीये नहीं हैं, इसलिए वे दीप नहीं जला पाएंगे। यह सुनकर दीया उदास हो गई। दीपक बोला, “दीया! अगर हम सच में दीवाली मनाना चाहते हैं, तो हमें उन घरों को भी रोशनी देनी चाहिए।” दीया ने मुस्कराकर कहा, “सही कहा दीपक, दीवाली तभी पूरी होती है जब सबके घरों में उजाला हो।” दोनों ने अपने बचत के पैसे निकाले — जो वे पटाखे खरीदने के लिए रखे थे — और उससे दीये, तेल और मिठाईयाँ खरीदीं। शाम होते ही दोनों ने उन गरीब परिवारों के घर जाकर दीये जलाए। हर चेहरे पर मुस्कान और आँखों में चमक थी। गाँव के लोग बोले, “आज सच में दीवाली आई है, क्योंकि इन बच्चों ने सबके दिलों में रोशनी जलाई है।” रात को जब आसमान में आतिशबाज़ी चमक रही थी, तब दीपक ने कहा, “दीया, आज मैंने सीखा — असली दीवाली घर में नहीं, दिल में रोशनी जलाने से होती है।” दीया मुस्कराई और बोली, “हाँ दीपक, जब सबके चेहरे पर खुशी हो, तभी दीवाली सच्ची बनती है।”
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