एक बार की बात है, एक घने जंगल में मोटू नाम का एक प्यारा-सा हाथी रहता था। मोटू बहुत ही नेकदिल था, लेकिन उसके दोस्त उसे अक्सर चिढ़ाते थे— “अरे मोटू! तुम तो इतना भारी चलते हो कि जमीन भी काँप जाती है!” मोटू हँस देता, लेकिन अंदर-अंदर वह सोचता— “काश मैं भी हल्का-फुल्का होकर हवा की तरह दौड़ पाता।” एक दिन जंगल में दौड़ की प्रतियोगिता हुई। सारे जानवर लाइन में खड़े थे—हिरन, खरगोश, बंदर, लोमड़ी… और आख़िर में धीरे-धीरे आता मोटू। सब उसे देखकर हँस पड़े। “तुम? दौड़ में? ये तो मज़ाक हो गया!” मोटू शर्म से कान नीचे कर लिया, पर उसने हार नहीं मानी। उसने सोचा— “कोशिश तो करूँगा ही!” दौड़ शुरू हुई— ढम! ढम! ढम! मोटू दौड़ रहा था… धीरे, लेकिन अपने पूरे दिल से। अचानक रास्ते में एक बड़ा पेड़ गिरा था। बाकी सारे जानवर रुके—कूद भी नहीं सकते थे। मोटू ने देखा और बोला, “अरे, ये तो मेरे बस की बात है!” उसने अपने बड़े-बड़े दाँतों से पेड़ को उठाया और किनारे रख दिया। बाकी जानवर बोल पड़े— “वाओ! मोटू तुम तो हीरो हो!” अब सभी फिर से दौड़ने लगे, लेकिन इस बार सब मोटू के साथ दौड़ रहे थे, उसके खिलाफ नहीं। आख़िर में मोटू भले ही आख़िरी आया… पर उसे पहला पुरस्कार मिला—“जंगल का सबसे मददगार दोस्त”। मोटू खुश होकर बोला, “तेज़ होने से ज्यादा जरूरी है—दिल का अच्छा होना।” और उस दिन से जंगल में कोई भी उसे उसके वजन को लेकर नहीं चिढ़ाता था।
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