धीरे-धीरे उसकी देसी-पिज्ज़ा की चर्चा पूरे गाँव में होने लगी। अब रामू खेती के साथ अपने घर के बाहर एक छोटा-सा “गाँव का पिज़्ज़ा ठेला” भी चलाने लगा। कमाई बढ़ी, घर में खुशी बढ़ी… और रामू हँसते हुए कहता— “मेरी गई-भैंस ही मेरा असली साथ है—दूध भी देती हैं और पनीर भी!”
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